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Jai Maa Narmada

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माँ नर्मदा की आरती
माँ नर्मदा की आरती
ॐ जय जगदानंदी, मैया जय आनंद्करनी
ब्रह्मा हरिहर शंकर रेवा शिव हरी शंकर रुद्री पालान्ती, ॐ जय जगादानंदी १

देवी नारद शारद तुम वरदायक, अभिनव पदचंडी,
सुरनर मुनि जन सेवत, सुरनर मुनि जन ध्यावत, शारद पदवंती, ॐ जय जगदानंदी

देवी धुम्रक वाहन राजत वीणा वादयती,
झुमकत झुमकत झुमकत, झननन झननन झननन, रमती राजन्ती, ॐ जय जगदानंदी २
देवी बाजत ताल मृदंगा, सुरमंडल रमती
तोड़ीतान तोड़ीतान तोड़ीतान तुररड तुररड तुररड, रमती सुरवंती, ॐ जय जगदानंदी 3

देवी सकल भुवन पर आप विराजत निशदिन आनंदी,
गावत गंगाशंकर सेवत रेवाशंकर तुम भाव मेटन्ती, ॐ जय जगदानंदी 4

मैयाजी को कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती,
अमरकंठ में विराजत, घाटन घाट विराजत कोटि रतन ज्योति, ॐ जय जगदानंदी 5

माँ रेवा की आरती जो कोई जन गावै मैया जो सुन्दर गावै
भजत शिवानन्द स्वामी जपत हरिहर स्वामी , मनवांछित फल पावै, ॐ जय जगदानंदी 6

प्रस्तुति : आदित्य सराफ, टेक्नो मैक्स, जबलपुर (म. प्र.)

नर्मदाष्टकम्
श्री नर्मदाष्टकम ,
सबिंदु सिन्धु सुस्खल तरंग भंग रंजितम
द्विषत्सु पाप जात जात कारि वारि संयुतम
कृतान्त दूत काल भुत भीति हारि वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे १

त्वदम्बु लीन दीन मीन दिव्य सम्प्रदायकम
कलौ मलौघ भारहारि सर्वतीर्थ नायकं
सुमस्त्य कच्छ नक्र चक्र चक्रवाक् शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे २

महागभीर नीर पुर पापधुत भूतलं
ध्वनत समस्त पातकारि दरितापदाचलम
जगल्ल्ये महाभये मृकुंडूसूनु हर्म्यदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ३

गतं तदैव में भयं त्वदम्बु वीक्षितम यदा
मृकुंडूसूनु शौनका सुरारी सेवी सर्वदा
पुनर्भवाब्धि जन्मजं भवाब्धि दुःख वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ४

अलक्षलक्ष किन्न रामरासुरादी पूजितं
सुलक्ष नीर तीर धीर पक्षीलक्ष कुजितम
वशिष्ठशिष्ट पिप्पलाद कर्दमादि शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ५

सनत्कुमार नाचिकेत कश्यपात्रि षटपदै
धृतम स्वकीय मानषेशु नारदादि षटपदै:
रविन्दु रन्ति देवदेव राजकर्म शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ६

अलक्षलक्ष लक्षपाप लक्ष सार सायुधं
ततस्तु जीवजंतु तंतु भुक्तिमुक्ति दायकं
विरन्ची विष्णु शंकरं स्वकीयधाम वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ७

अहोमृतम श्रुवन श्रुतम महेषकेश जातटे
किरात सूत वाड़वेषु पण्डिते शठे नटे
दुरंत पाप ताप हारि सर्वजंतु शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे ८

इदन्तु नर्मदाष्टकम त्रिकलामेव ये सदा
पठन्ति ते निरंतरम न यान्ति दुर्गतिम कदा
सुलभ्य देव दुर्लभं महेशधाम गौरवम
पुनर्भवा नरा न वै त्रिलोकयंती रौरवम ९

त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
नमामि देवी नर्मदे, नमामि देवी नर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
माँ रेवा की जय ! माँ नर्मदा जी जय !

प्रस्तुति : आदित्य सराफ, टेक्नो मैक्स, जबलपुर (म. प्र.)

नर्मदाजी की स्तुति
जय जय जगदम्ब मातु नर्मदा भवानी - २
निकसी जलधार जोर, पर्वत पहाड़ फोड़,
दुष्टन के गर्व मोड़, प्रगटी महारानी
जय जय जगदम्ब मातु नर्मदा भवानी - २

घाट- घाट छवि अनंत, सेवत सिद्ध साधु संत,
भक्तन आनंद देत, देवराजधानी
जय जय जगदम्ब मातु नर्मदा भवानी - २

भूषण अम्बर विशाल, केशर की खौर भाल ,
मानो रवि उदयकाल, शोभा सुखदानी
जय जय जगदम्ब मातु नर्मदा भवानी - २

अमरकंठ प्रगट भई, सागर सौं मिलन गई
मध्य कोटि तीर्थ रचे, मुक्ति की निशानी
जय जय जगदम्ब मातु नर्मदा भवानी - २

ओंकार महिमा अपार, शूलपाणी धुंआधार
शंकर कैलाश त्याग, बसें संग भवानी
जय जय जगदम्ब मातु नर्मदा भवानी - २

रेवां पद्मपलाश दीर्धनायानाम श्यामाम सुषोनाधरां
नासा मौक्तिक चारुहास - सुमुखीं रक्तांच रक्ताम्बराम |
तंत्रीमंक्गाताम करेण शनकै रुन्नाद यंतीम मुहुर
वन्दे मेकल कन्यकां शिव परां सर्वान्ग्भुषावृताम

ॐ नमोस्तुते पुण्यजले, नमो मकरगामिनी
नमस्ते पापमोचिन्ये, नमो देवी वरानने
नर्मदामादीनाथंच प्रणम्य परया गिरा
वैखर्या तू वदे±दुच्चेर नर्मदे हर नर्मदे
नमो नर्मदाये निजानंददाये, नमः शर्म्दाये शमाध्यर्पिकाए
नमो वर्मदाये वराभीती राये नमो हर्म्यदाये हरं दर्शिकाये

प्रस्तुति : आदित्य सराफ, टेक्नो मैक्स, जबलपुर (म. प्र.)

नर्मदा जी का परिचय
श्री नर्मदा मात्र नदी नहीं है, नर्मदा समस्त तत्वों की जननी है |

श्री नर्मदा आनंद तत्व, ज्ञान तत्व, सिद्धि तत्व, मोक्ष तत्व तथा समस्त तत्वों की अधिष्टात्री देवी है |

नर्मदा समस्त देव, ऋषि, मुनि, मानवो को शास्वत सुख-शांति प्रदान कर अजर -अमर बनाती है |

जहाँ सुख शान्ति है वहा नर्मदा है तथा जहाँ नर्मदा है वहां सुख -शान्ति है और इसी आत्म शांति को प्राप्त करने की लिए, आदि काल से ही योगी, साधु, संत, ग्रहस्त नर्मदा का आश्रय लेने आते थे | हर्ष दायनी नर्मदा की सिद्ध जल का अवगाहन कर असंख साधारण मानव भी सिद्ध संत, सिद्ध ऋषि,सिद्ध योगी, सिद्ध सिद्ध सिद्ध तथा सिद्ध पुरुस बनकर विश्व विख्यात हो गये हैं |

पुराण प्रमाण है की,नर्मदा से दिव्य - ज्ञान -प्राप्त करके है बाल्मीकि तथा व्यास जी ने अदभुत अलोकिक आदि महाकाव्य एवं पुराणोंकी रचना की थी | भगवान के अवतारों का आदि कारणभूता नर्मदा ही थीं | केवल देव,ऋषि,मुनि,मानव ही नहीं अपितु, मय दानव का शिल्प दैत्यराज बलि का विशाल भव, राक्षस राज रावण की शिव -भक्ति एवं नाभिगत अमृत का इन सबकी आदि कारणभूता माता नर्मदा ही हैं |

श्री नर्मदा के सृजन- आविभार्व के बाद, उमा सहित शिव अपनी आत्मज़ा क्रिया शक्ति नर्मदा को, कल्याण सम्बन्धी अपना कार्य भार सौपकर, कुछ निश्चिन्त से हो गये थे | शिव पार्वती ने आत्मजा नर्मदा की महिमा, महत्त्व, त्रय्लोक्य में स्वयं ही प्रस्थापित की थी अत: शिव शक्ति की कृपा दर्शन प्राप्त करने के पहिले, श्री नर्मदा की कृपानुमति अत्यावश्यक है क्योंकि नर्मदा, शिव-शक्ति की क्रिया - शक्ति हैं | नर्मदा-शिव- कल्याण प्राप्ति का द्वार हैं | नर्मदा की कृपा होने पर ही शिव कल्याण, सिद्धि,मौक्ष की प्राप्ति हो सकती है |

नर्मदा को सरितां वरा क्यों माना जाता है ?

नर्मदा माता की असंख्य विशेषताओ में श्री "नर्मदा की कृपा द्रष्टि" से दिखे कुछ कारण यह है :-

नर्मदा सरितां वरा -नर्मदा नदियों में सर्वश्रेष्ट हैं |
नर्मदा तट पर दाह संस्कार के बाद, गंगा तट पर इसलिए नहीं जाते हैं कि, नर्मदा जी से मिलने गंगा जी स्वयं आती है |
नर्मदा नदी पर ही नर्मदा पुराण है | अन्य नदियों का पुराण नहीं हैं |
नर्मदा अपने उदगम स्थान अमरकंटक में प्रकट होकर, नीचे से ऊपर की और प्रवाहित होती हैं, जबकि जल का स्वभाविक हैं ऊपर से नीचे बहना |
नर्मदा जल में प्रवाहित लकड़ी एवं अस्थिय कालांतर में पाषण रूप में परिवर्तित हो जाती हैं |
नर्मदा अपने उदगम स्थान से लेकर समुद्र पर्यन्त उतर एवं दक्षिण दोनों तटों में,दोनों और सात मील तक प्रथ्बी के अंदर ही अंदर प्रवाहित होती हैं , प्रथ्वी के उपर तो वे मात्र दर्शनार्थ प्रवाहित होती हैं | (उलेखनीय है कि भूकंप मापक यंत्रों ने भी प्रथ्बी कीइस दरार को स्वीकृत किया हैं) |
नर्मदा से अधिक तीब्र जल प्रवाह वेग विश्व की किसी अन्य नदी का नहीं है |
नर्मदा से प्रवाहित जल घर में लाकर प्रतिदिन जल चदाने से बदता है |
नर्मदा तट में जीवाश्म प्राप्त होते हैं | (अनेक क्षेत्रों के वृक्ष आज भी पाषण रूप में परिवर्तित देखे जा सकते हैं) |
नर्मदा से प्राप्त शिवलिग ही देश के समस्त शिव मंदिरों में स्थापित हैं क्योकि ,शिवलिग केवल नर्मदा में ही प्राप्त होते हैं अन्यत्र नहीं |
नर्मदा में ही बाण लिंग शिव एवं नर्मदेश्वर (शिव ) प्राप्त होते है अन्यत्र नहीं |
नर्मदा के किनारे ही नागमणि वाले मणि नागेश्वर सर्प रहते हैं अन्यत्र नहीं |
नर्मदा का हर कंकड़ शंकर होता है ,उसकी प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती क्योकि , वह स्वयं ही प्रतिष्टित रहता है |
नर्मदा में वर्ष में एक बार गंगा आदि समस्त नदियाँ स्वयं ही नर्मदा जी से मिलने आती हैं |
नर्मदा राज राजेश्वरी हैं वे कहीं नहीं जाती हैं |
नर्मदा में समस्त तीर्थ वर्ष में एक बार नर्मदा के दर्शनार्थ स्वयं आते हैं |
नर्मदा के किनारे तटों पर ,वे समस्त तीर्थ अद्रश्य रूप में स्थापित है जिनका वर्णन किसी भी पुराण, धर्मशास्त्र या कथाओं में आया हैं |
नर्मदा का प्रादुर्भाव स्रष्टि के प्रारम्भ में सोमप नामक पितरों ने श्राद्ध के लिए किया था |
नर्मदा में ही श्राद्ध की उत्पति एवं पितरो द्वारा ब्रम्हांड का प्रथम श्राद्ध हुआ था अतः नर्मदा श्राद्ध जननी हैं |
नर्मदा पुराण के अनुसार नर्मदा ही एक मात्र ऐसी देवी (नदी )हैं ,जो सदा हास्य मुद्रा में रहती है |
नर्मदा तट पर ही सिद्दी प्राप्त होती है| ब्रम्हांड के समस्त देव, ऋषि, मुनि, मानव (भले ही उनकी तपस्या का क्षेत्र कही भी रहा हो) सिद्दी प्राप्त करने के लिए नर्मदा तट पर अवश्य आये है| नर्मदा तट पर सिद्धि पाकर ही वे विश्व प्रसिद्ध हुए |
नर्मदा (प्रवाहित ) जल में नियमित स्नान करने से असाध्य चर्मरोग मिट जाता है |
नर्मदा (प्रवाहित ) जल में तीन वर्षों तक ,प्रत्येक रविवार को नियमित स्नान करने से श्वेत कुष्ठ रोग मिट जाता हैं किन्तु ,कोई भी रविवार खंडित नहीं होना चाहिए |
नर्मदा स्नान से समस्त क्रूर ग्रहों की शांति हो जाती है | नर्मदा तट पर ग्रहों की शांति हेतु किया गया जप पूजन हवन,तत्काल फलदायी होता है |
नर्मदा अपने भक्तों को जीवन काल में दर्शन अवश्य देती हैं ,भले ही उस रूप में हम माता को पहिचान न सके |
नर्मदा की कृपा से मानव अपने कार्य क्षेत्र में ,एक बार उन्नति के शिखर पर अवश्य जाता है |
नर्मदा कभी भी मर्यादा भंग नहीं करती है ,वे वर्षा काल में पूर्व दिशा से प्रवाहित होकर , पश्चिम दिशा के ओर ही जाती हैं अन्य नदियाँ ,वर्षा काल में अपने तट बंध तोडकर ,अन्य दिशा में भी प्रवाहित होने लगती हैं |
नर्मदा पर्वतो का मान मर्दन करती हुई पर्वतीय क्षेत्रमें प्रवाहित होकर जन ,धन हानि नहीं करती हैं (मानव निर्मित बांधों को छोडकर )अन्य नदियाँ मैदानी , रितीले भूभाग में प्रवाहित होकर बाढ़ रूपी विनाशकारी तांडव करती हैं |
नर्मदा ने प्रकट होते ही अपने अद्भुत आलौकिक सौन्दार्य से समस्त सुरों ,देवो को चमत्कृत करके खूव छकाया था | नर्मदा की चमत्कारी लीला को देखकर शिव पर्वती हसते -हसते हाफ्ने लगे थे |
नेत्रों से अविरल आनंदाश्रु प्रवाहित हो रहे थे| उन्होंने नर्मदा का वरदान पूर्वक नामकरण करते हुए कहा - देवी तुमने हमारे ह्रदय को अत्यंत हर्षित कर दिया, अब पृथ्वी पर इसी प्रकार नर्म (हास्य ,हर्ष ) दा(देती रहो ) अतः आज से तुम्हारा नाम नर्मदा होगा |
नर्मदा के किनारे ही देश की प्राचीनतम -कोल ,किरात ,व्याध ,गौण ,भील, म्लेच आदि जन जातियों के लोग रहा करते थे ,वे वड़ेशिव भक्त थे |
नर्मदा ही विश्व में एक मात्र ऐसी नदी हैं जिनकी परिक्रमा का विधान हैं, अन्य नदियों की परिक्रमा नहीं होती हैं |
नर्मदा का एक नाम दचिन गंगा है |
नर्मदा मनुष्यों को देवत्व प्रदान क्र अजर अम्र र बनाती हैं |
नर्मदा में ६० करोड़, ६०हजार तीर्थ है (कलियुग में यह प्रत्यक्ष द्रष्टिगोचर नहीं होते) |
नर्मदा चाहे ग्राम हो या वन, सभी स्थानों में पवित्र हैं जबकि गंगा कनखल में एवं सरस्वती कुरुक्षेत्र में ही ,अधिक पवित्र मानी गई हैं|
नर्मदा दर्शन मात्र से ही प्राणी को पवित्र कर देती हैं जबकि ,सरस्वती तीन दिनों तक स्नान से, यमुना सात दिनों तक स्नान से गंगा एक दिन के स्नान से प्राणी को पवित्र करती हैं |
नर्मदा पितरों की भी पुत्री हैं अतः नर्मदा किया हुआ श्राद्ध अक्षय होता है |
नर्मदा शिव की इला नामक शक्ति हैं |
नर्मदा को नमस्कार कर नर्मदा का नामोच्चारण करने से सर्प दंश का भय नहीं रहता है |
नर्मदा के इस मंत्र का जप करने से विषधर सर्प का जहर उतर जाता है |
नर्मदाये नमः प्रातः, नर्मदाये नमो निशि| नमोस्तु नर्मदे तुम्यम, त्राहि माम विष सर्पतह| (प्रातः काल नर्मदा को नमस्कार, रात्रि में नर्मदा को नमस्कार, हे नर्मदा तुम्हे नमस्कार है, मुझे विषधर सापों से बचाओं (साप के विष से मेरी रक्षा करो) |
नर्मदा आनंद तत्व ,ज्ञान तत्व सिद्धि तत्व ,मोक्ष तत्व प्रदान कर , शास्वत सुख शांति प्रदान करती हैं |
नर्मदा का रहस्य कोई भी ज्ञानी विज्ञानी नहीं जान सकता है | नर्मदा अपने भक्तो पर कृपा कर स्वयं ही दिव्य द्रष्टि प्रदान करती है |
नर्मदा का कोई भी दर्शन नहीं कर सकता है नर्मदा स्वयं भक्तों पर कृपा करके उन्हें बुलाती है |
नर्मदा के दर्शन हेतु समस्त अवतारों में भगवान् स्वयं ही उनके निकट गए थे |
नर्मदा सुख ,शांति , समर्धि प्रदायनी देवी हैं |
नर्मदा वह अम्र तत्व हैं ,जिसे पाकर मनुष्य पूर्ण तृप्त हो जाता है |
नर्मदा देव एवं पितृ दोनो कार्यों के लिए अत्यंत पवित्र मानी गई हैं |
नर्मदा का सारे देश में श्री सत्यनारायण व्रत कथा के रूप में इति श्री रेवा खंडे कहा जाता है |
श्री सत्यनारायण की कथा अर्थात घर बैठे नर्मदा का स्मरण |
नर्मदा में सदाशिव, शांति से वास करते हैं क्युकी जहाँ नर्मदा हैं और जहां शिव हैं वहां नर्मदा हैं |
नर्मदा शिव के साथ ही यदि अमरकंटक की युति भी हो तो साधक को ल्लाखित लक्ष की प्राप्ति होती हैं नर्मदा के किनारे सरसती के समस्त खनिज पदार्थ हैं |
नर्मदा तट पर ही भगवान् धन्वन्तरी की समस्त औषधीया प्राप्त होती हैं नर्मदा तट पर ही त्रेता युग में भगवान् श्री राम द्वारा प्रथम वार कुम्वेश्व्र तीर्थ की स्थापना हुई थी जिसमें सह्र्स्ती के समस्त तीर्थों का जल , रिशी मुनियों द्वारा कुम्भो ,घंटों में लाया गया था नर्मदा के त्रिपुरी तीर्थ देश का केंद्र बिंदु भी था |
नर्मदा नदी ब्रम्हांड के मध्य भाग में प्रवाहित होती हैं नर्मदा हमारे शरीर रूपी ब्रम्हांड के मध्य भाग (ह्रदय ) को पवित्र करें तो , अष्टदल कमल पर कल्याणकारी सदा शिव स्वयमेव आसीन हो जावेगें |
नर्मदा का ज्योतिष शास्त्र मुह्र्तों में रेखा विभाजन के रूप में महत्त्व वर्णित हैं (भारतीय ज्यातिष) |
नर्मदा के दक्षिण और गुजरात के भागों में विक्रम सम्बत का वर्ष ,कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को प्रारंभ होता हैं (भारतीय ज्यातिष) |
नर्मदा सर्वदा हमारे अन्तः करण में स्थित हैं |
नर्मदा माता के कुछ शव्द सूत्र उनके चरणों में समर्पित हैं ,उनका रह्र्स्य महिमा भगवान् शिव के अतिरिक्त कौन जान सकता हैं |

नर्मदा की परिक्रमा
नर्मदा जी वैराग्य की अधिष्ठात्री मूर्तिमान स्वरूप है। गंगा जी ज्ञान की, यमुना जी भक्ति की, ब्रह्मपुत्रा तेज की, गोदावरी ऐश्वर्य की, कृष्णा कामना की और सरस्वती जी विवेक के प्रतिष्ठान के लिये संसार में आई हैं। सारा संसार इनकी निर्मलता और ओजस्विता व मांगलिक भाव के कारण आदर करता है व श्रद्धा से पूजन करता है। मानव जीवन में जल का विशेष महत्व होता है। यही महत्व जीवन को स्वार्थ, परमार्थ से जोडता है। प्रकृति और मानव का गहरा संबंध है। नर्मदा तटवासी माँ नर्मदा के करुणामय व वात्सल्य स्वरूप को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। बडी श्रद्धा से पैदल चलते हुए इनकी परिक्रमा करते हैं।



नर्मदा जी की परिक्रमा 3 वर्ष 3 माह और तेरह दिनों में पूर्ण होती है। अनेक देवगणों ने नर्मदा तत्व का अवगाहन ध्यान किया है। ऐसी एक मान्यता है कि द्रोणपुत्र अभी भी माँ नर्मदा की परिक्रमा कर रहे हैं। इन्हीं नर्मदा के किनारे न जाने कितने दिव्य तीर्थ, ज्योतिर्लिंग, उपलिग आदि स्थापित हैं। जिनकी महत्ता चहुँ ओर फैली है। परिक्रमा वासी लगभ्ग तेरह सौ बारह किलोमीटर के दोनों तटों पर निरंतर पैदल चलते हुए परिक्रमा करते हैं। श्री नर्मदा जी की जहाँ से परिक्रमावासी परिक्रमा का संकल्प लेते हैं वहाँ के योग्य व्यक्ति से अपनी स्पष्ट विश्वसनीयता का प्रमाण पत्र लेते हैं। परिक्रमा प्रारंभ् श्री नर्मदा पूजन व कढाई चढाने के बाद प्रारंभ् होती है।

नर्मदा की इसी ख्याति के कारण यह विश्व की अकेली ऐसी नदी है जिसकी विधिवत परिक्रमा की जाती है । प्रतिदिन नर्मदा का दर्शन करते हुए उसे सदैव अपनी दाहिनी ओर रखते हुए, उसे पार किए बिना दोनों तटों की पदयात्रा को नर्मदा प्रदक्षिणा या परिक्रमा कहा जाता है । यह परिक्रमा अमरकंटक या ओंकारेश्वर से प्रारंभ करके नदी के किनारे-किनारे चलते हुए दोनों तटों की पूरी यात्रा के बाद वहीं पर पूरी की जाती है जहाँ से प्रारंभ की गई थी ।

व्रत और निष्ठापूर्वक की जाने वाली नर्मदा परिक्रमा 3 वर्ष 3 माह और 13 दिन में पूरी करने का विधान है, परन्तु कुछ लोग इसे 108 दिनों में भी पूरी करते हैं । आजकल सडक मार्ग से वाहन द्वारा काफी कम समय में भी परिक्रमा करने का चलन हो गया है । नर्मदा परिक्रमा के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करने के लिए स्वामी मायानन्द चैतन्य कृत नर्मदा पंचांग (1915) श्री दयाशंकर दुबे कृत नर्मदा रहस्य (1934), श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी कृत नर्मदा दर्शन (1988) तथा स्वामी ओंकारानन्द गिरि कृत श्रीनर्मदा प्रदक्षिणा पठनीय पुस्तकें हैं जिनमें इस परिक्रमा के तौर-तरीकों और परिक्रमा मार्ग का विवरण विस्तार से मिलता है । इसके अतिरिक्त श्री अमृतलाल वेगड द्वारा पूरी नर्मदा की परिक्रमा के बारे में लिखी गई अद्वितीय पुस्तकें ’’सौंदर्य की नदी‘‘ नर्मदा तथा ’’अमृतस्य नर्मदा‘‘ नर्मदा परिक्रमा पथ के सौंदर्य और संस्कृति दोनों पर अनूठे ढंग से प्रकाश डालती है । श्री वेगड की ये दोनों पुस्तकें हिन्दी साहित्य के प्रेमियों और नर्मदा अनुरागियों के लिए सांस्कृतिक-साहित्यिक धरोहर जैसी हैं । यद्वपि ये सभी पुस्तकें नर्मदा पर निर्मित बांधें से बने जलाशयों के कारण परिक्रमा पथ के कुछ हिस्सों के बारे में आज केवल एतिहासिक महत्व की ही रह गई है, परन्तु फिर भी नर्मदा परिक्रमा के इच्छुक किसी भी व्यक्ति के लिए अवश्य पठनीय है । नर्मदा की पहली वायु परिक्रमा संपन्न करके श्री अनिल माधव दवे द्वारा लिखी गई पुस्तक ’अमरकण्टक से अमरकण्टक तक‘ (2006) भी आज के परिप्रेक्ष्य में अत्यंत प्रासंगिक है ।

पतित पावनी नर्मदा की विलक्षणता यह भी है कि वह दक्षिण भारत के पठार की अन्य समस्त प्रमुख नदियों के विपरीत पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है । इसके अतिरिक्त केवल ताप्ती ही पश्चिम की ओर बहती है परन्तु एक वैज्ञानिक धारणा यह भी है कि करोडों वर्ष पहले ताप्ती भी नर्मदा की सहायक नदी ही थी और बाद में भूगर्भीय उथल-पुथल से दोनों के मुहाने पर समुद्र केकिनारों में भू-आकृति में बदलाव के फलस्वरूप ये अलग-अलग होकर समुद्र में मिलने लगीं । कुछ भी रहा हो परन्तु इस विषय पर भू-वैज्ञानिक आमतौर पर सहमत हैं कि नर्मदा और ताप्ती विश्व की प्राचीनतम नदियाँ हैं । नर्मदा घाटी में मौजूद चट्टानों की बनावट और शंख तथा सीपों के जीवाश्मों की बडी संख्या में मिलना इस बात को स्पष्ट करता है कि यहां समुद्री खारे पानी की उपस्थिति थी । यहां मिले वनस्पतियों के जीवाश्मों में खरे पानी के आस-पास उगने वाले पेड-पौधों के सम्मिलित होने से भी यह धारणा पुष्ट होती है कि यह क्षेत्र करोडों वर्ष पूर्व भू-भाग के भीतर अबर सागर के घुसने से बनी खारे पानी की दलदली झील जैसा था । नर्मदा पुराण से भी ज्ञात होता है कि नर्मदा नदी का उद्गम स्थल प्रारंभ में एक अत्यन्त विशाल झील के समान था । यह झील संभवतः समुद्र के खारे पानी से निर्मित झील रही होगी । कुछ विद्वानों का मत है कि धार जिले में बाघ की गुफाओं तक समुद्र लगा हुआ था और संभवतः यहां नर्मदा की खाडी का बंदरगाह रहा होगा ।

नर्मदा का उद्गम म0प्र0 के अनूपपुर जिले (पुराने शहडोल जिले का दक्षिण-पश्चिमी भाग) में स्थित अमरकण्टक के पठार पर लगभग 22*40श् छ अक्षांश तथा 81*46श् म् देशान्तर पर एक कुण्ड में है । यह स्थान सतपुडा तथा विंध्य पर्वतमालाओं को मिलने वाली उत्तर से दक्षिण की ओर फैली मैकल पर्वत श्रेणी में समुद्र तल से 1051 मी0 ऊंचाई पर स्थित है । अपने उद्गम स्थल से उत्तर-पश्चिम दिशा में लगभग 8 कि0मी0 की दूरी पर नर्मदा 25 मी0 ऊंचाई से अचानक नीचे कूद पडती है जिससे ऐश्वर्यशाली कपिलधारा प्रपात का निर्माण होता है । इसके बाद लगभग 75 कि0मी0 तक नर्मदा पश्चिम और उत्तर-पश्चिम दिशा में ही बहती है । अपनी इस यात्रा में आसपास के अनेक छोटे नदी-नालों से पानी बटोरते-सहेजते नर्मदा सशक्त होती चलती है ।

डिंडोरी तक पहुंचते-पहुंचते नर्मदा से तुरर, सिवनी, मचरार तथा चकरार आदि नदियाँ मिल जाती हैं । डिंडोरी के बाद पश्चिमी दिशा में बहने का रूझान बनाए हुए भी नर्मदा सर्पाकार बहती है । अपने उद्गम स्थल से 140 कि0मी0 तक बह चुकने के बाद मानों नर्मदा का मूड बदलता है और वह पश्चिम दिशा का प्रवाह छोडकर दक्षिण की ओर मुड जाती है । इसी दौरान एक प्रमुख सहायक नदी बुढनेर का नर्मदा से संगम हो जाता है । दक्षिण दिशा में चलते-चलते नर्मदा को मानों फिर याद आ जाता है कि वह तो पश्चिम दिशा में जाने के लिए घर से निकली थी अतः वह वापस उत्तर दिशा में मुडकर मण्डला नगर को घेरते हुए एक कुण्डली बनाती है । मण्डला में दक्षिण की ओर से आने वाली बंजर नदी इससे मिल जाती है जिससे चिमटे जैसी आकृति का निर्माण होता है । यहाँ ऐसा लगता है कि नर्मदा बंजर से मिलने के लिए खुद उसकी ओर बढ गई हो और मिलाप के तुरंत बाद वापस अपने पुराने रास्ते पर चल पडी हो । इसके बाद नर्मदा मोटे तौर पर उत्तर की ओर बहती है । जबलपुर के पहले नर्मदा पर बरगी बांध बन जाने के बाद यहां विशाल जलाशय का निर्माण हो गया है ।

जबलपुर में ही भेंडाघाट में नर्मदा का दूसरा प्रसिद्ध प्रपात धुंआधार पडता है जहां नर्मदा अत्यन्त वेग से 15 मी0 नीचे छलांग मारकर मानों नृत्य करने लगती है । धुंआधार प्रपात के आगे थोडी दूरी पर ही विश्व प्रसिद्ध संगमरमर की चट्टानों के गलियारे से होकर बहती हुई यह नदी प्राकृतिक सौंदर्य की अनुपम छटा बिखेरती है । जबलपुर से आगे चलकर नर्मदा नरसिंहपुर, होशंगाबाद, सीहोर व हरदा जिलों से होकर बहती है जहां शेर, शक्कर, तवा, गंजाल, अजनाल जैसी नदियाँ इससे जुडती चली जाती हैं । हरदा जिले में स्थित नेमावर को नर्मदा मध्य बिन्दु या नाभिस्थल माना जाता है । हरदा जिले को छोडने के बाद नर्मदा पूर्वी निमाड जिले में प्रवेश करती है जहां काफी विरोध, जन आंदोलनों और लंबी कानूनी लडाई के बाद पुनासा में नर्मदा पर बांध बनकर बिजली उत्पादन करने लगा है। अब यहाँ से आगे बढने के लिए नर्मदा स्वतंत्र नहीं है बल्कि बांध का संचालन करने वाले व्यवस्थापकों और अभियन्ताओं के निर्णय के अनुसार घटती-बढती रहती है ।

पुनासा से आगे एक के बाद एक बांधों के पाश में बंध जाने के कारण पिछले दशक में नर्मदा के स्वरूप में काफी बदलाव आया है । इस क्षेत्र में कभी नर्मदा को अपना कूदने और छलांग लगाने वाला बचपन मानों फिर से याद आ जाया करता था और धारडी गांव के निकट सहसा लगभग 12 मीटर की ऊंचाई से पुनः छलांग लगा बैठती थी । परन्तु उसकी इस कोशिश में प्रागैतिहासिक काल की चट्टानें आडे आ जाने से छोटे-बडे अनेक प्रपाप निर्मित हो जाया करते थे जिनकी छटा अप्रतिम हुआ करती थी । इस स्थान की रमणीयता का अनुभव इसे देखकर ही किया जा सकता है । वेगडजी ने इस स्थान को छोटे-बडे अनेक प्रपातों के कारण प्रपातों के डिपार्टमेन्टल स्टोर का नाम दिया था जहां कोई अपनी क्षमता और इच्छा के अनुसार मनपसंद प्रपात चुनकर उसे घंटों निहारते बैठा रह सकता था । दुर्लभ प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण वह स्थल जून 2007 में ओंकारेश्वर बांध में जल-भराव के साथ ही जलाशय में डूब गया है । इस स्थान के पश्चात देवास और खण्डवा जिले के जंगलों और घाटियों से बहती हुई नर्मदा प्रसिद्ध ओंकारेश्वर मांधाता तक जा पहुंचती है जहां भारत के प्रसिद्ध द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक ओंकारेश्वर का धाम है । यहां पर मांधाता द्वीप से ठीक पहले ओंकारेश्वर बांध लगभग पूरा हो चुका है जो नर्मदा के प्रवाह को पुनः नियंत्रित करगा ।

माधांता पहुंचने से पहले नर्मदा की दो प्रमुख सहायिकाएंॅ कनाड उत्तरी तट से और कावेरी दक्षिणी तट से आ जुडतीं हैं । ओंकारेश्वर बांध के द्वारा निर्मित जलाशय का बैकवाटर लगभग पुनासा तक पहुंचेगा अतः जल-भराव के बाद नर्मदा का यह हिस्सा लगभग पूरी तरह जलाशय में ही बदल जाएगा। ओंकारेश्वर के बाद पुनः जंगल के क्षेत्र से बहती हुई नर्मदा बडवाह के आसपास वनों से बाहर आ जाती है और बडवानी-झाबुआ में पुनः वनक्षेत्र में प्रवेश करने के पहले यह वनों से बाहर ही बहती है । बडवाह के पास नर्मदा के उत्तरी तट से चोरल नदी आ मिलती है और बडवानी तक पहुंचते-पहुंचते बेदा, डेब तथा गोई नदियों का नर्मदा के दक्षिणी तट से संगम हो जाता है ।

इसके आगे धार जिले में मान तथा उरी नदियाँ व झाबुआ जिले में हथनी नदी नर्मदा के उत्तरी तट से आ मिलती है । यह सारा क्षेत्र उत्तरी तट पर विंध्याचल श्रेणी की पहाडयों और दक्षिणी तट पर सतपुडा श्रेणी की पहाडयों द्वारा निर्मित नौका जैसे भू-भाग के बीच पडता है । झाबुआ जिले से आगे नर्मदा म0प्र0 से बाहर हो जाती है । इस प्रकार अमरकण्टक में प्रकट हुई नर्मदा म0प्र0 को छोडने के पहले 1079 कि0मी0 लंबा सफर तय कर लेती है जो इसकी कुल लंबाई 1312 कि0मी0 का 82.24 प्रतिशत है । नर्मदा बेसिन का कुल क्षेत्रफल 98496 वर्ग कि0मी0 है जो 4 राज्यों में पडता है । इसमें से 85149 वर्ग कि0मी0 (86.19 प्रतिशत) म0प्र0 में आता है तथा शेष 13647 वर्ग कि0मी0 (13.81 प्रतिशत) गुजरात, महाराष्ट्र तथा छत्तीसगढ राज्यों में आता है ।

नर्मदा बेसिन के जलग्रहण क्षेत्र को छोटी-छोटी जलग्रहण इकाइयों में बांटा गया है । म0प्र0 से बाहर आने के बाद नर्मदा 32 कि0मी0 लंबाई में म0प्र0 और महाराष्ट्र राज्य के बीच की सीमा तथा फिर 40 कि0मी0 लंबाई में महाराष्ट्र व गुजरात राज्य के बीच सीमा बनाती है व इसके बाद भृगुकच्छ में सागर मिलन के पहले गुजरात राज्य में 161 कि0मी0 की दूरी तय करती है ।

परिक्रमावासियों के सामान्य नियम
1. प्रतिदिन नर्मदा जी में स्नान करें। जलपान भी रेवा जल का ही करें।
2. प्रदक्षिणा में दान ग्रहण न करें। श्रद्धापूर्वक कोई भेजन करावे तो कर लें क्योंकि आतिथ्य सत्कार का अंगीकार करना तीर्थयात्री का धर्म है। त्यागी, विरक्त संत तो भेजन ही नहीं करते भ्क्षिा करते हैं जो अमृत सदृश्य मानी जाती है।
3. व्यर्थ वाद-विवाद, पराई निदा, चुगली न करें। वाणी का संयम बनाए रखें। सदा सत्यवादी रहें।
4. कायिक तप भी सदा अपनाए रहें- देव, द्विज, गुरु, प्राज्ञ पूजनं, शौच, मार्जनाम्। ब्रह्मचर्य, अहिसा च शरीर तप उच्यते।।
5. मनः प्रसादः सौम्य त्वं मौनमात्म विनिग्रह। भव संशुद्धिरित्येतत् मानस तप उच्यते।। (गीता 17वां अध्याय) श्रीमद्वगवतगीता का त्रिविध तप आजीवन मानव मात्र को ग्रहण करना चाहिए। एतदर्थ परिक्रमा वासियों को प्रतिदिन गीता, रामायणादि का पाठ भी करते रहना उचित है।
6. परिक्रमा आरंभ् करने के पूर्व नर्मदा जी में संकल्प करें। माई की कडाही याने हलुआ जैसा प्रसाद बनाकर कन्याओं, साधु-ब्राह्मणों तथा अतिथि अभ्यागतों को यथाशक्ति भेजन करावे।
7. दक्षिण तट की प्रदक्षिणा नर्मदा तट से 5 मील से अधिक दूर और उत्तर तट की प्रदक्षिणा साढे सात मील से अधिक दूर से नहीं करना चाहिए।
8. कहीं भी नर्मदा जी को पार न करें। जहाँ नर्मदा जी में टापू हो गये वहाँ भी न जावें, किन्तु जो सहायक नदियाँ हैं, नर्मजा जी में आकर मिलती हैं, उन्हें भी पार करना आवश्यक हो तो केवल एक बार ही पार करें।
9. चतुर्मास में परिक्रमा न करें। देवशयनी आषाढ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक सभी गृहस्थ चतुर्मास मानते हैं। मासत्मासे वैपक्षः की बात को लेकर चार पक्षों का सन्यासी यति प्रायः करते हैं। नर्मदा प्रदक्षिणा वासी विजयादशी तक दशहरा पर्यन्त तीन मास का भी कर लेते हैं। उस समय मैया की कढाई यथाशक्ति करें। कोई-कोई प्रारम्भ् में भी करके प्रसन्न रहते हैं।
10. बहुत सामग्री साथ लेकर न चलें। थोडे हल्के बर्तन तथा थाली कटोरी आदि रखें। सीधा सामान भी एक दो बार पाने योग्य साथ रख लें।
11. बाल न कटवायें। नख भी बारंबार न कटावें। वानप्रस्थी का व्रत लें, ब्रह्मचर्य का पूरा पालन करें। सदाचार अपनायें रहें। श्रृंगार की दृष्टि से तेल आदि कभी न लगावें। साबुन का प्रयोग न करें। शुद्ध मिट्टी का सदा उपयोग करें।
12. परिक्रमा अमरकंटन से प्रारंभ् कर अमरकंटक में ही समाप्त होनी चाहिए। जब परिक्रमा परिपूर्ण हो जाये तब किसी भी एक स्थान पर जाकर भ्गवान शंकर जी का अभ्षिेक कर जल चढावें। पूजाभ्षिेक करें करायें। मुण्डनादि कराकर विधिवत् पुनः स्नानादि, नर्मदा मैया की कढाई उत्साह और सामर्थ्य के अनुसार करें। ब्राह्मण, साधु, अभ्यागतों को, कन्याओं को भी भेजन अवश्य करायें फिर आशीर्वाद ग्रहण करके संकल्प निवृत्त हो जायें और अंत में नर्मदा जी की विनती करें।
 
 
 
 
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